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Showing posts from March, 2021

द्रोपदी ने तीन स्थानों पर शब्दों का किया था दुरुपयोग, परिणाम में हुआ था महाभारत

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शब्दों को पहले तौलो फिर दो मोल :- श्रीकृष्ण ब्रजद्वार हाथरस। 18 दिन के युद्ध ने, द्रोपदी की उम्र को 80 वर्ष जैसा कर दिया था ...शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी शहर में चारों तरफ़ विधवाओं का बाहुल्य था..  पुरुष इक्का-दुक्का ही दिखाई पड़ता था  अनाथ बच्चे घूमते दिखाई पड़ते थे और उन सबकी वह महारानी द्रौपदी हस्तिनापुर के महल में निश्चेष्ट बैठी हुई शून्य को निहार रही थी ।  तभी,श्रीकृष्ण कक्ष में दाखिल होते हैं , द्रौपदी कृष्ण को देखते ही दौड़कर उनसे लिपट जाती है ... कृष्ण उसके सिर को सहलाते रहते हैं और रोने देते हैं .....थोड़ी देर में, उसे खुद से अलग करके समीप के पलंग पर बैठा देते हैं ।  द्रोपदी : यह क्या हो गया सखा ?? ऐसा तो मैंने नहीं सोचा था । कृष्ण : *नियति बहुत क्रूर होती है पांचाली..वह हमारे सोचने के अनुरूप नहीं चलती* *वह हमारे कर्मों को परिणामों में बदल देती है..* तुम प्रतिशोध लेना चाहती थी और, तुम सफल हुई, द्रौपदी !  तुम्हारा प्रतिशोध पूरा हुआ... सिर्फ दुर्योधन और दुशासन ही नहीं, सारे कौरव समाप्त हो गए  तुम्हें तो प्रसन्न होन...

मृत्यु सत्य है जीवन एक कला है और पुनर्जन्म एक परिणाम है। आइये समझते हैं

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क्या पुनर्जन्म होता है ? सदाशिव की इच्छा से होता है सृष्टि का सृजन  ब्रजद्वार हाथरस। आइये कुछ प्रश्न और उनके उत्तर तलाशते हुए पुनर्जन्म से संबंधित कुछ तथ्यों को खंगालते हैं। आखिर पुनर्जन्म होता क्या  ? इसका इस जीवन में क्या  ?महत्व है। कुल मिलाकर इस रोचक तार्किक विषय पर चर्चा करते हैं और जानते हैं सत्य क्या है और सनातन क्या है ? (1) प्रश्न :- पुनर्जन्म किसको कहते हैं ? उत्तर :- जब जीवात्मा एक शरीर का त्याग करके किसी दूसरे शरीर में जाती है तो इस बार बार जन्म लेने की क्रिया को पुनर्जन्म कहते हैं । (2) प्रश्न :- पुनर्जन्म क्यों होता है ? उत्तर :- जब एक जन्म के अच्छे बुरे कर्मों के फल अधुरे रह जाते हैं तो उनको भोगने के लिए दूसरे जन्म आवश्यक हैं । (3) प्रश्न :- अच्छे बुरे कर्मों का फल एक ही जन्म में क्यों नहीं मिल जाता ? एक में ही सब निपट जाये तो कितना अच्छा हो ? उत्तर :- नहीं जब एक जन्म में कर्मों का फल शेष रह जाए तो उसे भोगने के लिए दूसरे जन्म अपेक्षित होते हैं । (4) प्रश्न :- पुनर्जन्म को कैसे समझा जा सकता है ? उत्तर :- पुनर्जन्म को समझने के लिए जीवन...

क्या इस बच्चे के तार्किक प्रश्नों के उत्तर हैं आपके पास

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सनातन से संपन्नता की ओर एक प्रयास   ब्रजद्वार हाथरस।  एक पाँच छ: साल का मासूम सा बच्चा अपनी छोटी बहन को लेकर मंदिर के एक तरफ कोने में बैठा हाथ जोडकर भगवान से न जाने क्या मांग रहा था । कपड़े में मैल लगा हुआ था मगर निहायत साफ, उसके नन्हे नन्हे से गाल आँसूओं से भीग चुके थे । बहुत लोग उसकी तरफ आकर्षित थे और वह बिल्कुल अनजान अपने भगवान से बातों में लगा हुआ था । जैसे ही वह उठा एक अजनबी ने बढ़ के उसका नन्हा सा हाथ पकड़ा और पूछा : - "क्या मांगा भगवान से" उसने कहा : - "मेरे पापा मर गए हैं उनके लिए स्वर्ग, मेरी माँ रोती रहती है उनके लिए सब्र, मेरी बहन माँ से कपडे सामान मांगती है उसके लिए पैसे".. "तुम स्कूल जाते हो"..? अजनबी का सवाल स्वाभाविक सा सवाल था । हां जाता हूं, उसने कहा । किस क्लास में पढ़ते हो ? अजनबी ने पूछा नहीं अंकल पढ़ने नहीं जाता, मां चने बना देती है वह स्कूल के बच्चों को बेचता हूँ । बहुत सारे बच्चे मुझसे चने खरीदते हैं, हमारा यही काम धंधा है । बच्चे का एक एक शब्द मेरी रूह में उतर रहा था । "तुम्हारा कोई रिश्तेदार" न चाह...

कंबल के कर्म ने चोरों को दिलाई शर्म

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संग से सोच और सोच से संस्कार फिर बनती हैं संस्कृतियां ब्रजद्वार हाथरस।  एक दिन फकीर के घर रात चोर घुसे। घर में कुछ भी न था।  सिर्फ एक कंबल था, जो फकीर ओढ़े लेटा हुआ था।  सर्द रात, फकीर रोने लगा, क्योंकि घर में चोर आएं और चुराने को कुछ नहीं है, इस पीड़ा से रोने लगा।  उसकी सिसकियां सुन कर चोरों ने पूछा कि भई क्यों रोते हो? फकीर बोला कि आप आए थे - जीवन में पहली दफा, यह सौभाग्य तुमने दिया! मुझ फकीर को भी यह मौका दिया! लोग फकीरों के यहां चोरी करने नहीं जाते, सम्राटों के यहां जाते हैं।  तुम चोरी करने क्या आए, तुमने मुझे सम्राट बना दिया।    ऐसा सौभाग्य! लेकिन फिर मेरी आंखें आंसुओ से भर गई हैं, सिसकियां निकल गईं,  क्योंकि घर में कुछ है नहीं।  तुम अगर जरा दो दिन पहले खबर कर देते तो मैं इंतजाम कर रखता दो—चार दिन का समय होता तो कुछ न कुछ मांग—तूंग कर इकट्ठा कर लेता। अभी तो यह कंबल भर है मेरे पास, यह तुम ले जाओ। और देखो इनकार मत करना। इनकार करोगे तो मेरे हृदय को बड़ी चोट पहुंचेगी। चोर घबरा गए, उनकी कुछ समझ में नहीं आया...

सनातन की वेदना

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🚩🌸 जय सियाराम 🌸🚩 मन्दिर लगता आडंबर , और मदिरालय में खोए हैं , भूल गए कश्मीरी पंडित , और अफजल पे रोए हैं........ इन्हें गोधरा नहीं दिखा , गुजरात दिखाई देता है , एक पक्ष के लोगों का , जज्बात दिखाई देता है........ हिन्दू को गाली देने का , मौसम बना रहे हैं ये , धर्म सनातन पर हँसने को , फैशन बना रहे हैं ये....... टीपू को सुल्तान मानकर , खुद को बेच कर फूल गए , और प्रताप की खुद्दारी की , घास की रोटी भूल गए....... आतंकी की फाँसी इनको , अक्सर बहुत रुलाती है , गाय माँस के बिन भोजन की , थाली नहीं सुहाती है....... होली आई तो पानी की , बर्बादी पर ये रोते हैं , रेन डाँस के नाम पर , बहते पानी से मुँह धोते हैं........ दीवाली की जगमग से ही , इनकी आँखें डरती हैं , थर्टी फर्स्ट की आतिशबाजी , इनको क्यों नहीं अखरती है....... देश विरोधी नारों को , ये आजादी बतलाते हैं , राष्ट्रप्रेम के नायक संघी , इनको नहीं सुहाते हैं........ सात जन्म के पावन बंधन , इनको बहुत अखरते हैं , लिव इन वाले बदन के , आकर्षण में आहें भरते हैं..... आज समय की धारा कहती , मर्यादा का भान रखो , मूल्य...

हनुमान का ऋण राम जी पर भी भारी

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* ।।हनुमानजी की उधारी से हारे राम।।* *इस दिव्य कर्ज को समझोगे तो आनन्द ही आनन्द पाओगे* *सब पर कर्जा हनुमान जी का,सब ऋणी हनुमानजी महराज के।*  ब्रजद्वार हाथरस ।   रामजी लंका से विजय प्राप्त कर लौटे तो, भगवान ने विभीषण जी, जामवंत जी, अंगद जी, सुग्रीव जी सब को अयोध्या से विदा किया। तो सब ने सोचा हनुमान जी को प्रभु बाद में बिदा करेंगे, लेकिन रामजी ने हनुमानजी को विदा ही नहीं किया,अब प्रजा बात बनाने लगी कि क्या बात सब गए हनुमानजी नहीं गए अयोध्या से! अब दरबार में काना फूसी शुरू हुई कि हनुमानजी से कौन कहे जाने के लिए, तो सबसे पहले माता सीता की बारी आई कि आप ही बोलो कि हनुमानजी चले जाएं। माता सीता बोलीं मै तो लंका में विकल पड़ी थी, मेरा तो एक एक दिन एक एक कल्प के समान बीत रहा था, वो तो हनुमानजी थे,जो प्रभु मुद्रिका लेके गए, और धीरज बंधवाया कि...! *कछुक दिवस जननी धरु धीरा।* *कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।* *निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।* *तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥* मै तो अपने बेटे से बिल्कुल भी नहीं बोलूंगी अयोध्या छोड़कर जाने के लिए,आप किसी और से बुलावा लो।...

ब्रज की पटरानी श्री राधिका रानी और उनकी अष्ट सखियाँ

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आइये जानते हैं अष्ट सखियों का परिचय  ब्रजद्वार हाथरस । माँ आराध्या भक्तों के भय को हरने वाली राधिका रानी महारास की अधिष्ठात्री देवी हैं। जबकि उनकी अष्ट सखियाँ महारास का अभिन्न अंग है। सभी सखियों की अलग-अलग सेवायें नियत है।           आइये जानते हैं महारास की आराध्या और सभी सखियों के विषय में परिचय। भाद्रपद शुक्ल पक्ष में श्री  जी (राधा रानी) व अष्ट गोपियों के आविर्भाव तिथियों के विषय में जो जनकारी हुई है, उसे जानते हैं। श्रीजी (राधा रानी जी):- पिता- ऋषभानु जी गोप व माता- किर्तिदा देवी तथा गावं- बरसना। जबकि उनके जन्म के विषय में बताया गया है भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी। जिसे अब राधाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है।           अष्ट सखियों में से एक हैं ललिता सखी। जिनके पिता का नाम है महाभानु गोप और माता का नाम- शारदी। निवास स्थान है ऊँचागांव और जन्म बताया जाता है- भाद्रपद, शुक्ल पक्ष, षष्ठी। विशाखा सखी भी प्रमुख सखियों में आती हैं। जिनके पिता का नाम है बताया गया है सुभानु गोप और माता- देवदानी। जबकि गांव है ऑ...

ललिता और विशाख की शरण में पहुंचते ब्रजद्वार के भक्त

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राधा रस में रंगे ब्रजद्वार के भक्त विशाखा जी के दरबार -ललिता, तुगं विद्या, दानबिहारी, कुशलबिहारी, देह कुंड के भी किये दर्शन  ब्रजद्वार हाथरस । ब्रज के द्वारा देहरी हाथरस के भक्तजनों ने  इस बार  ब्रज चौरासी कोस यात्रा के  पड़ाव में  ब्रज के कमाई गांव स्थित विशाखा जी के दरबार पहुंचे और अपनी अर्जी लगाई।          ब्रज द्वार हाथरस के बरसाना मंडल के तत्वावधान में इन दिनों ब्रज चौरासी कोस यात्रा का क्रम चल रहा है। इस बार प्रभात फेरी के बाद सभी भक्तों ने सादाबाद गेट स्थित बूटीनाथ मंदिर से बसों द्वारा ब्रज में प्रवेश किया। ब्रज के गांव कमई स्थित विशाखा सखी के दरबार पहुंचे भक्तों ने  जमकर भजन कीर्तन किया। साथ ही विशाखा जी के दर्शन कर प्रसाद ग्रहण किया। यहां पर भगवान की लीला में सीधे हाथ की तरफ विशाखा  व सुदेवी देवी व उल्टे हाथ की तरफ रंग देवी व इंदुलेखा की सेवा के दर्शन हैं। विशाखा जी का दूसरा नाम अनुराधा भी है। इससे पूर्व यात्रा ऊंचा गांव स्थित ललिता सखी पर पहुंची थी। जहां पर ललिता जी के दर्शन के साथ-...