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Showing posts from May, 2023

जय भांडीर: जहाँ पड़ी थी राधा-कृष्ण की भांवरें

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जहाँ पड़ी थी राधा-कृष्ण की भँवरियां -ब्रह्म जी बने थे पुरोहित -ब्रज बरसाना मंडल की भंवरिया ज्योनार  ब्रजद्वार (हाथरस)। जहाँ ब्रह्म जी ने स्वयं राधा-कृष्ण की भाँवरें पड़वाई थी वही स्थान है भांडीर वन। दरअसल ब्रजद्वार से संचालित मासिक ब्रज बरसाना यात्रा बीते रविवार को इस पौराणिक स्थान पर पहुंची तो भक्तों को यहाँ के वैभव की जानकरी हुई।          गर्ग संहिता की माने तो यही स्थान भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी के दांपत्य के प्रमाण का स्थान है। ऐसा माना जाता है कि इन दोनों के मध्य प्रेम संबंध की नहीं थे बल्कि प्रेम से बढ़कर भी एक नाता था और वह नाता था पति-पत्नी का। इस स्थान के वृक्ष आज भी राधा कृष्ण के प्रेम और मिलन की गवाही देते हैं। गर्ग संहिता के अनुसार इस संदर्भ में यह कथा है कि एक बार नंदराय जी बालक श्री कृष्ण को लेकर भांडीर वन से गुजर रहे थे। उसी समय आचानक देवी राधा प्रकट हुई। देवी राधा के दर्शन पाकर नंदराय जी ने श्री कृष्ण को राधा जी की गोद में दे दिया। श्री कृष्ण बाल रूप त्यागकर किशोर बन गए। बताते हैं कि तभी ब्रह्मा जी भी ...

चरित्र की नीच हरकत और अकबर ने मांगी प्राणों की भीख

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चरित्र की नीच हरकत और अकबर ने मांगी प्राणों की भीख -महाराणा की भतीजी ने सिखाया अकबर को चारित्रिक सुधार का पाठ अकबर की महानता का गुणगान तो कई चाटुकार इतिहासकारों ने किया है लेकिन अकबर की औछी हरकतों का वर्णन बहुत कम इतिहासकारों ने किया है।  अकबर अपने गंदे इरादों से प्रतिवर्ष दिल्ली में नौरोज का मेला आयोजित करवाता था जिसमें पुरुषों का प्रवेश निषेध था अकबर इस मेले में महिला की वेष-भूषा में जाता था और जो महिला उसे मंत्र मुग्ध कर देती थी उसे दासियाँ छल कपटवश अकबर के सम्मुख ले जाती थी। एक दिन नौरोज के मेले में महाराणा प्रताप की भतीजी छोटे भाई महाराज शक्तिसिंह की पुत्री मेले की सजावट देखने के लिए आई जिनका नाम बाईसा किरणदेवी था जिनका विवाह बीकानेर के पृथ्वीराज जी से हुआ। बाईसा किरणदेवी की सुंदरता को देखकर अकबर अपने आप पर काबू नही रख पाया और उसने बिना सोचे समझे दासियों के माध्यम से धोखे से जनाना महल में बुला लिया और जैसे ही अकबर ने बाईसा किरणदेवी को स्पर्श करने की कोशिश की किरणदेवी ने कमर से कटार निकाली और अकबर को ऩीचे पटकर छाती पर पैर रखकर कटार गर्दन पर लगा दी और कहा...

*ना जीवन सत्य है ना मृत्यु सत्य है यह तो संसार का नियम है*सत्य की परिभाषा 👇🏻*जीवन और मृत्य के मध्यकाल में कमाई कर प्रभु प्राप्ति ही सत्य है*

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*ना जीवन सत्य है ना मृत्यु सत्य है यह तो संसार का नियम है* सत्य की परिभाषा 👇🏻 *जीवन और मृत्य के मध्यकाल में कमाई कर प्रभु प्राप्ति ही सत्य है* ब्रजद्वार। जीवन और मृत्यु एक अकाट्य सत्य हैं। जीवन मिला है तो मृत्यु भी होना तय है। इसलिए जीवन और मृत्यु के मध्य जो समय है वह ही हमारी कमाई का मार्ग है। अब प्रश्न यह उठता है कि हमको कमाना क्या चाहिए। सच मायने में जो कमाई करता है वह धनी कहलाता है और जो कमाई का अर्थ नहीं समझ पाता वह जीविकोपार्जन के चक्र में फंस कर ठगा कहलाता है। आया कुछ समझ में! नहीं आया तो आओ मिलकर समझते हैं।         बोलिये जय श्री राधेश्याम। जीवन का अर्थ अवसर (आपको एक मौका मिला है) अर्थात पंचतत्व से निर्मित यह शरीर आपको एक एक्सपायरी डेट (समाप्ति की अवधी) के साथ मिलता है। फिर समझिये बहुत गंभीर बात है। कोई निर्मित दवा मरीज को मर्ज (बीमारी) की समाप्ति के लिए दी जाती है। अर्थात आत्मा को अपने दूषित कर्मों से मुक्ति प्रभु जी हमको यह पंचतत्व से निर्मित शरीर इस शर्त पर देते हैं कि हम अपनी जीवन अवधि अर्थात जन्म और मौत के बीच के समय को बतौर एक ...