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Showing posts from May, 2024

भक्त वत्सल श्री नृसिंह भगवान प्राकट्य दिवस की बधाई

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*भक्तवत्सल श्री नृसिंह भगवान के प्राकट्य दिवस की आपको बहुत-बहुत बधाई* शत्रुओं की समाप्ति और कामयाबी के देवता हैं नृसिंह भगवान आइये जानते हैं नृसिंह कवच के संबंध में। भगवान विष्णु के अवतरणों में नृसिंह अवतार को सर्वाधिक उग्र तथा भयानक माना गया है। विद्वजनों की माने तो नृसिंह भगवान के स्मरण मात्र से ही दुष्टों में भय का संचार होने लग जाता है। विशेषकर प्रेत, पिशाच आदि दुष्ट शक्तियां उनका नाम सुनने मात्र से ही भाग जाती हैं। कई बार कुछ लोगों को प्रेत बाधा हो जाती है तो उनके लिए भी नृसिंह कवच के प्रयोग से बचाया जाता है। प्रेत बाधा से पीड़ित लोगों की पीड़ा दूर करने के लिए कई प्रकार के उपाय किए जाते हैं परन्तु वे विफल हो जाते हैं। इस स्थिति में व्यक्ति को नृसिंह कवच का आश्रय लेना चाहिए। इस कवच के एक बार जप करने मात्र से ही व्यक्ति का समस्त भय तथा दुख नष्ट हो जाते हैं। नृसिंह कवच का विधान: किसी शुभ मुहूर्त में स्नान आदि से निवृत्त होकर पीले वस्त्र पहन कर पूजा के आसन पर बैठ कर सर्वप्रथम गणेशजी की वंदना करें। तत्पश्चात् अपने इष्टदेव, गुरु तथा अन्य देवी-देवताओं की स्तुति कर...

कन्हैयालाल उत्सव के अध्यक्ष बने पवन पौरुष

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कन्हैयालाल मेला महोत्सव के अध्यक्ष बने पवन पौरुष -ऐतिहासिक रूप देने के लिए अभी से होंगी तैयारी: पवन -150 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है ब्रजद्वार का यह प्राचीन मंदिर  -पूरे जिले में यहाँ का कन्हैयालाल जन्मोत्सव होता है विशेष  हाथरस। ब्रज की द्वार देहरी के आराध्य ठाकुर कन्हैयालाल जी महाराज के हुए चुनाव में पवन सिंह पौरुष को बतौर अध्यक्ष मेला महोत्सव चुना गया। सर्व सम्मति से हुए चुनाव में जैसे पूर्व अध्यक्ष कन्हैयालाल ने आलोक वार्ष्णेय सर्राफ के नाम का प्रस्ताव रखा तो आलोक वार्ष्णेय ने पवन सिंह पौरुष के नाम को लाकर समर्थन कर दिया। तभी पूरे सदन ने भी ताली बजा और कन्हैयालाल के जय घोष कर पवन को मालाओं से लाद दिया। चुनाव में उपस्थित सभी श्रद्धालुओं ने भी पवन को बधाइयाँ दी।         इस अवसर पर पवन सिंह पौरुष ने घोषणा करते हुए कहा कि जो जिम्मेदारी आप सभी मुझे सौंपी है उसे बखूबी जिम्मेदारी के साथ निभाऊंगा। मेला महोत्सव को ऐतिहासिक बनाने के लिए पवने सभी से सहयोग की अपेक्षा की। इस अवसर पर खासतौर से बतौर संरक्षक रमेशचन्द्र ब्रह्मचारी, सेव...

द्वापर में यहाँ पर हुआ था प्रथम महारास

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महारास प्राकट्य स्थल है चंपकलता सखी मंदिर -ब्रजद्वार से मासिक यात्रा पहुंची चंपकलता सखी के दरबार  -भजन-कीर्तन के बाद महाप्रसादी का लिया आनंद  ब्रजद्वार (हाथरस)। महारास का प्राकट्य स्थल है चंपकलता सखी मंदिर। सर्व प्रथम यहाँ पर ही राधाकृष्ण ने महारास को रचाया था। अष्ट सखियों में चौथे स्थान की प्रमुख सखी हैं चंपकलता जी। भक्ति की इन मर्मज्ञ बातों का व्याख्यान श्रीमद्भागवत प्रवक्ता दीदी मुरिलका शर्मा ने गहवरवन वन स्थित राधारस मंदिर में दिया। दरअसल ब्रजद्वार हाथरस से मासिक बरसाना जाने वाली यात्रा का पहला पड़ाव बरसाना के निकट सखी श्री चंपकलता मंदिर ही था। यहाँ पहुंचने पर यहाँ के सेवायत महाराज जी ने बताया कि चंपकलता जी राधा जी की प्रमुख सखियों में से थी और उनका चौथे स्थान आता था।  दतिया के राजा ने जब कालिया नाग लीला के लिए यहाँ के रासधारियों को आमंत्रित किया तो लीला के बाद काफी प्रभावित हुये और एक स्वर्ण से बने मुकुट को भेंट किया। वह आज भी मथुरा में सरकारी संरक्षण में जमा है और साल में एक बार रासलीला उत्सव पर ही निकलता है।   ...