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सुदर्शन चक्र 'कवच'

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🌷श्री गणेशाय नमः🌷 🙏श्री गोपीजन वल्लभाय नमः🙏 अथ श्री सुदर्शन 'कवच' ॐ वैष्णवानां हिरक्षार्थं श्री वल्लभनिरुपितः। सुदर्शन महामन्त्रो वैष्णवानां हितावहः॥१॥  मन्त्रामध्येनिरुप्यन्ते चक्राकारं च लिख्यते। उत्तरा गर्भरक्षच परिक्षित हितेरतः ॥२॥ ब्रह्मास्त्र वारणं चैव भक्तानां भय भंजनः। वंध च दुष्ट दैत्यानां खंड खंड च कारयेत् ॥३॥  वैष्णवानां हितार्थाय चक्रं धारयेत् हरिः। पीताम्बरो परब्रह्म वनमाली गदाधरः ॥४॥  कोटि कन्दर्पलावण्यो गोपिका प्राणवल्लभ:। श्री वल्लभः कृपानाथो गिरधरः शत्रुमर्दन:॥५॥ दावाग्नि दर्पहत्ता च गोपी नां भय नाशन:। गोपालो गोप कन्यभिः समावृत्तो ऽ धितिष्टते ॥६॥ ब्रजमंडल प्रकाशीच कालिन्दी विरहानलः। स्वरूपानन्द दानार्थां तापनोत्तर भावनः ॥७॥ निकुंज बिहारमावग्ने देहि मे निजदर्शनं गो गोपिका श्रुत कीर्णो  वेणुवादन तत्परः ॥८॥ कामरूपीकला वांश्च  कामिन्यां कामदो विभुः। मन्मथ मथुरानाथो माद्यवो मकरध्वजः ॥९॥ श्रीधरः श्रीकरश्चचैव  श्री निवासः सताँगति। मुक्तिदो भूक्तिदो विष्णुभुद्यरो भुत भावनः॥१०॥ सर्व दुःख हरो वीरो दुष्टदानव नाश...

तुलसीदास जी भी एक वैदिक वैज्ञानिक थे, सुंदरकांड में किया गया हवाओं का वर्णन अद्भुत है

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सुंदरकांड पढ़ते हुए 25 वें दोहे पर ध्यान थोड़ा रुक गया । तुलसीदास जी ने सुन्दर कांड में,  जब हनुमान जी ने लंका मे आग लगाई थी, उस प्रसंग पर लिखा है - हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास। अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।। अर्थात : जब हनुमान जी ने लंका को अग्नि के हवाले कर दिया तो -- भगवान की प्रेरणा से उनचासों पवन चलने लगे। हनुमान जी अट्टहास करके गर्जे और आकार बढ़ाकर आकाश से जा लगे। मैंने सोचा कि इन उनचास मरुत का क्या अर्थ है ? यह तुलसी दास जी ने भी नहीं लिखा। फिर मैंने सुंदरकांड पूरा करने के बाद समय निकालकर 49 प्रकार की वायु के बारे में जानकारी खोजी और अध्ययन करने पर सनातन धर्म पर अत्यंत गर्व हुआ। तुलसीदासजी के वायु ज्ञान पर सुखद आश्चर्य हुआ, जिससे शायद आधुनिक मौसम विज्ञान भी अनभिज्ञ है ।          आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि वेदों में वायु की 7 शाखाओं के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है।  अधिकतर लोग यही समझते हैं कि वायु तो एक ही प्रकार की होती है, लेकिन उसका रूप बदलता रहता है, जैसे कि ठंडी वायु, गर्म वायु और...

कृपा में भक्ति का संचार होता है, लाभ में सुख का संसार होता है

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कृपा में भक्ति का संचार होता, लाभ में सुख का संसार होता है *कृपा और लाभ में अंतर क्या है ?* जब भगवान की कृपा होती है तो मन भक्ति की ओर मुड़ता है। जब अच्छे फलों का उदय होता है अर्थात संसारी भाषा में कहें तो जब अच्छे दिन आते हैं तो वह पूर्व जन्म के अच्छे कर्मों का परिणाम होता है, लेकिन प्रभु कृपा सदैव आपके बुरे कर्मों के प्रभाव को कम करते-करते आपको तपाती है। अर्थात जिस प्रकार सोना आग में जल कर शुद्ध होता है, उसी प्रकार मानव कष्टों को सहते हुए प्रभु भक्ति में डूब कर संसार से विरक्त होता जाता है। लगातार कष्टों का आना और फिर भी प्रभु में लगन हो तो समझ लो प्रभु की आप पर कृपा है।         जबकि संसारी भाषा में लोग कृपा का आशय , वैभव और बढ़ते सामाजिक सम्मान से लगाते हैं। बाबा गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने रामचरित मानस में लिखा भी है ....... *जा पर कृपा राम की होई, ता पर कृपा करहिं सब कोई।* *जिनके कपट, दम्भ नहिं माया, तिनके ह्रदय बसहु रघुराया।।*   भावार्थ - जो कपट, दम्भ और माया से परे है, वो ही भगवान् श्री राम के कृपा पात्र ...

श्रीराम विवाह महा महोत्सव पर ब्रजद्वार बना मिथल और अवथ की तराह

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**ले ले नाम राम और सीता गवाही सुंदर मंगल* - ब्रजदार में दौहराया गया श्री सीताराम विवाह इतिहास - जगह जगह भव्य स्वागत और पूरी रास्त हुई पुष्प वर्षा ब्रज की द्वारा देहरी (हाथरस नगरी)। शुक्रवार को आज फिर एक बार त्रेता युगीन माहौल का अभ्युदय हुआ। हनुमान गली स्थित श्री राम दरबार मंदिर में सजी  अवधपुरी से चारों दूल्हा सरकार की बारात शोभा यात्रा नगर भ्रमण कर तालाब चौराहा स्थित राम चौक मंदिर श्री राम दरबार पर बनी मिथिलापुरी पहुंची। जहां पर अवध के बारातियों का भव्य और हृदय स्पर्शी स्वागत मिथला वासियों ने किया।         मौका था श्रीराम विवाह पंचमी महामहोत्सव का और स्थान था ब्रज की द्वारा देहरी कहे जाने वाला नगर जिसे वैदिक नाम हाथरस से भी जाना जाता है। जहां अवधपुरी और मिथिलापुरी का एक अनोखा संगम देखने को मिला। नगर के बीचों बीच हनुमान गली स्थित प्राचीन मंदिर श्रीराम दरबार पर अवधपुरी सरीखा माहौल  स्थापित किया गया जहां बारातियों का साफा बांध कर व शिल्पा हार करा कर भव्य स्वागत किया गया। श्री राम बैंड के साथ विभिन्न झांकियों और...

दिवाली पर विवाद क्यों समाधान तो अंदर है

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कब मनयें दिवाली ? - पूजन ही तो करना तो क्यों न दो दिन करें - फिर किस बात का विवाद (हथरस ) ब्रजद्वारा। जब तें रामु ब्याहि घर आए । नित नव मंगल मोद बधाए॥ अर्थात रामजी जब सभी भाइयों सहित विवाह कर अयोध्या लौटे थे तो दियों के प्रकाश से अयोध्या दिव्य प्रकाश में बदल गई थी। भारतीय संस्कृति यानी सनातन का सार है। जब-जब सर्व कल्याण के लिए उत्तम वक्त आता है तो दिवाली पर्व मनाया जाता है। दिवाली का अर्थ है मसलन 'दीपों से सुसज्जित पंक्तियां'। दिवाली  शब्द संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना है। 'दीप' अर्थात (मिट्टी के दिये में जगमगाती लो) और  'आवली'  अर्थात (पंक्ति बद्ध)। अर्थ है 'दीपक' + 'आवली'। यानी   (पंक्तिबद्ध दियो  में जगमगाती अग्नि की लो)।दीपावली को रोशनी का पर्व भी कहा गया है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई, अज्ञानता पर ज्ञान, और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है। जबकि पुनः अयोध्या फिर एक वार दीपों से जगमगाई थी और वह वक्त था राजा राम जी का 14 वर्ष का वन गमन संपन्न कर अयोध्या लौटने का। अब चूंकि दिवाली पर्व माता लक्ष्मी से भी...

जिहादी आतंक को चाहिए गोपाल पाठा 16 अगस्त की वह भयानक जिहाद

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आज फिर एक गोपाल पाठा की जरूरत है जी हाँ! बाकई आज हमें हर प्रदेश और क्षेत्र की जेहादी आतंकवाद से रक्षा के लिए एक गोपाल पाठा की जरूरत है। दिल्ली के दंगे, बंगाल की बत्तर हालत और बंगला देश के मौजूदा हालात हमको परमपूज्य और देश के महान सपूत श्री गोपाल पाठा खटीक की याद दिलाते हैं।         बकौल 1947 के बंटवारे में कलकत्ता जिन्ना के फेंके षड्यंत्र का हिस्सा बन भारत से अलग हो जाता यदि श्री महावीर गोपाल पाठा खटीक न होते तो। इतिहास के पन्नों को उठायें तो भाईचारे जैसे शब्द से भी भयानक चीख और मौत का तांडव दिखाई देता है। बतादें कि जिन्ना ने अपने डायरेक्ट एक्शन डे के लिए कोलकाता (कलकत्ता) को चुना था। क्योंकि वो चाहता था कि कोलकाता पाकिस्तान में हो। उसका मुख्य कारण था उस वक्त कोलकाता भारत का एक प्रमुख व्यापारिक शहर था। यही कारण था जिन्ना कोलकाता को खोना नहीं चाहता था।          कोलकाता को हिंदू मुक्त बनाने का मिशन सुहरावर्दी को दिया गया था, जो उस वक्त बंगाल का मुख्यमंत्री था, और जिन्ना के प्रति वफादार था। उस वक्त 1946 में कलकत्ता में हि...

बख्तियार ने दिया था इंसानियत को धोखा, मोदी ने मर्म को तलाश मल्लम लगाना किया आरंभ

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बख्तियार ने दिया था इंसानियत को धोखा, मोदी ने मर्म को तलाश मल्लम लगाना किया आरंभ  1200 सौ साल के जख्म पर नरेंद्र दामोदर दास मोदी ने 19 जून, 2024  बुधवार को मल्लम (दवा) लगाना आरंभ कर दिया और एक बार फिर से अपनी राष्ट्र (सेवा) नीति को स्पष्ट कर दिया, लेकिन सत्ता की लोलुप राज्य करो नीति के अनितिज्ञों को आज भी स्लामियत में अपना भविष्य सुरक्षित दिखाई दे रहा है। जबकि मोदी जी देश, समाज और संस्कृति के काम कर रहे हैं। नालंदा का पुनरोद्धार इसका एक ताजा उदाहरण है। साभार          इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि आक्रांता बख्तियार खिलजी ने 831 ईस्वी में भारत के प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय की इमारत में आग लगा दी थी और जमकर कत्लेआम किया था। इस आग से विश्वविद्यालय में रखी करीब 05 लाख से भी ज्यादा पुस्तकें राख हो गयी थी। उन बेकसूर बौद्ध भिक्षुओं का आखिर क्या कसूर था, जिनको मौत के घाट उतार गया था। इस जघन्य आगजनी और हत्याकांड का सिर्फ और सिर्फ एक ही मकसद था कि भारत की सनातन संस्कृति और उसके ज्ञान को नष्ट करना। सुनी-कही मने तो बख्तियार को एक गंभीर ...