कृपा में भक्ति का संचार होता है, लाभ में सुख का संसार होता है
कृपा में भक्ति का संचार होता, लाभ में सुख का संसार होता है *कृपा और लाभ में अंतर क्या है ?* जब भगवान की कृपा होती है तो मन भक्ति की ओर मुड़ता है। जब अच्छे फलों का उदय होता है अर्थात संसारी भाषा में कहें तो जब अच्छे दिन आते हैं तो वह पूर्व जन्म के अच्छे कर्मों का परिणाम होता है, लेकिन प्रभु कृपा सदैव आपके बुरे कर्मों के प्रभाव को कम करते-करते आपको तपाती है। अर्थात जिस प्रकार सोना आग में जल कर शुद्ध होता है, उसी प्रकार मानव कष्टों को सहते हुए प्रभु भक्ति में डूब कर संसार से विरक्त होता जाता है। लगातार कष्टों का आना और फिर भी प्रभु में लगन हो तो समझ लो प्रभु की आप पर कृपा है। जबकि संसारी भाषा में लोग कृपा का आशय , वैभव और बढ़ते सामाजिक सम्मान से लगाते हैं। बाबा गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने रामचरित मानस में लिखा भी है ....... *जा पर कृपा राम की होई, ता पर कृपा करहिं सब कोई।* *जिनके कपट, दम्भ नहिं माया, तिनके ह्रदय बसहु रघुराया।।* भावार्थ - जो कपट, दम्भ और माया से परे है, वो ही भगवान् श्री राम के कृपा पात्र ...