सुदर्शन चक्र 'कवच'
🌷श्री गणेशाय नमः🌷
🙏श्री गोपीजन वल्लभाय नमः🙏
अथ श्री सुदर्शन 'कवच'
ॐ वैष्णवानां हिरक्षार्थं श्री वल्लभनिरुपितः। सुदर्शन महामन्त्रो वैष्णवानां हितावहः॥१॥
मन्त्रामध्येनिरुप्यन्ते चक्राकारं च लिख्यते। उत्तरा गर्भरक्षच परिक्षित हितेरतः ॥२॥
ब्रह्मास्त्र वारणं चैव भक्तानां भय भंजनः। वंध च दुष्ट दैत्यानां खंड खंड च कारयेत् ॥३॥
वैष्णवानां हितार्थाय चक्रं धारयेत् हरिः। पीताम्बरो परब्रह्म वनमाली गदाधरः ॥४॥
कोटि कन्दर्पलावण्यो गोपिका प्राणवल्लभ:। श्री वल्लभः कृपानाथो गिरधरः शत्रुमर्दन:॥५॥
दावाग्नि दर्पहत्ता च गोपी नां भय नाशन:। गोपालो गोप कन्यभिः समावृत्तो ऽ धितिष्टते ॥६॥
ब्रजमंडल प्रकाशीच कालिन्दी विरहानलः। स्वरूपानन्द दानार्थां तापनोत्तर भावनः ॥७॥
निकुंज बिहारमावग्ने देहि मे निजदर्शनं गो गोपिका श्रुत कीर्णो वेणुवादन तत्परः ॥८॥
कामरूपीकला वांश्च कामिन्यां कामदो विभुः। मन्मथ मथुरानाथो माद्यवो मकरध्वजः ॥९॥
श्रीधरः श्रीकरश्चचैव श्री निवासः सताँगति। मुक्तिदो भूक्तिदो विष्णुभुद्यरो भुत भावनः॥१०॥
सर्व दुःख हरो वीरो दुष्टदानव नाशकः श्री नृसिंहो महाविष्णु: श्री निवासः सताँगतिः॥११॥
चिदानन्दमयो नित्य पूर्ण व्रह्म सनातनः कोटि भानु प्रकाशी च कोटि प्रकाशवान॥१२॥
भक्त प्रियः पद्मनेत्रो भक्ताना वांछित प्रद:। हृदिकृष्णो मुखेकृष्णो नेत्रो कृष्णश्चकर्णयो:॥१३॥
भक्ति प्रियश्च श्री कृष्ण: सर्व कृष्णमयं जगत्। कालं मृत्युंयमं दूतं भूतं प्रेतं च प्रयूयते॥१४॥
ॐ नमो भगवते महाप्रतापाय महाविभूति पतये वज्रदेह वज्रकाय वज्रतुण्ड वज्रनख वज्रमुख वज्रवाहु वज्रनेत्र वज्रदंत वज्रकरकमठ भुमात्माकराय श्री मकर पिगलाक्ष उग्रप्रलय कालाग्निरौद्रवीर भद्रावतार पूर्णव्रह्म परमात्मने ऋषि भुनिवद्य शिवास्त्र व्रह्मास्त्र वैष्णवास्त्र नारायणास्त्र कालशक्ति कालदण्ड कालपाश अघोरास्त्र निवारणाय पाशुपतास्त्र मृडास्त्र शर्वशक्ति परास्त कराय परविद्या निवारण अग्नि दीप्ताय
अर्थव वेद ऋग्वेद सामवेद यजुर्वेद सिद्ध कराय निराहाराय वायुवेगे श्रीवालकृण: प्रतिष्ठानंदकरः स्थल जलानिगमे मतोत्भभेदि सर्व शत्रु छेदि छेदि ममवैरिन खादयोत्खादय संजीवनी पर्वतोच्चाटय च्चाटय डाकिनी शाकिनी विध्वंसकराय महाप्रतापाय निजलीला प्रदर्शकाय निष्कलंकृत नन्दकुमार वटुक व्रह्मचारी निकुंञ्जस्थ भक्ति स्नेहकराय दुष्टजन स्तंभनाय सर्वपापग्रह कुमार्ग ग्राहन छेदय छेदय भेन्दि भिन्दि खादय काटकान ताडय ताडय मारय मारय शोषय शोषय ज्वालय ज्वालय संहारय संहारय (देवदत्त) नाशय नाशय अति शोषय शोषय मम सर्वत्र रक्ष रक्ष महापुररुषाय
सर्व दुःख विनाशनाय ग्रहमंडल भूतमंडल प्रेतमंडल पिशाचमंडल उच्चाटन उच्चाटनायअन्तर भवादिक ज्वर माहेश्वर ज्वर वैष्णव ज्वर ब्रह्म ज्वर विषम ज्वर शीत ज्वर वात ज्वर कफ ज्वर एकाहिक द्वाहिक त्र्याहिक चातुर्थिक अर्द्धमासिक मासिक षाण्डमासिक संवत्सरादिकर भ्रमि भ्रमि छेदय छेदय भिन्दि भिन्दि महाबल पराक्रमाय महाविपत्ति निवारणाय भक्तिजन कल्पा कल्पद्रुमाय दुष्टजन मनोरथ स्तंभनाय क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजन वल्लभाय नमः। पिशाचान राक्षसान चैव हृदय रोगांश्च दारुणान् भूचरान खेचरान सर्वे डाकिनी शाकिनी तथा ॥१५॥
नाटकं चेटकं चैव छल छिंद्रन न दृश्यते। अकाले मरणं तस्य शोक दोषो न लभ्यते ॥१६॥
सर्व विघ्न क्षयं यान्ति रक्षमे गोपिका प्रियः। भयदांवाग्नि चौराणां विग्रहे राज संकटे॥१७॥
॥फल श्रुति॥
व्याल व्याघ्र महा शत्रु बैरिबंधो न लभ्ययते। आधि व्याधि हरश्चैव ग्रहपीडा विनाशने॥१८॥
संग्रामे जयदस्त स्मादध्याये देवं सुदर्शन। सप्तादश इमे श्लोका यन्त्र मध्ये च लिख्यते। वैष्णवानां इदं यंत्रं अन्येभ्यश्च न दीयते वंश वृद्धिर्भवेत्तस्य श्रोता च फलमाप्नुयात्॥ सुर्दशन महामंत्रो लभते जय मंगलम्। सर्व दुःख हरश्चेन्द्रअंग शूल अक्ष शूल उदर शूल गुद शूल कटि शूल कुक्षि शूल जानू शूल जंघ शूल हस्त शूल पाद शूल वायु शूल स्तन शूल सर्व शूलान् निर्मूलय दानव दैत्य कामिनी वेताल ब्रह्म राक्षस कालाहत अनंत वासुकी तक्षक कर्कोट तक्षक कालीय स्थल रोग जलरोग नागपाश कालपाश विषं निर्विषं
कृष्णi त्वमहं शरणागतः। वैष्णवार्थ कृतं यत्र श्री वल्लभ निरुपितम्
॥इति श्री वल्लभाचर्य कृतं सुदर्शन कवच॥
॥ श्रीबाल कृष्णो विजयते ॥
॥ श्री कृष्ण: शरमंमम्॥
॥श्री अनंदकंद बालमुकुंद भगवान की जय ॥
॥ धर्म की श्रेष्टता उसके सही अनुकरण में है ॥
॥ कृष्णं वन्दे जगत गुरुंम् ॥
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