बाबा महाराज के संघर्ष ने दिया ब्रज को फिर से पौराणिक स्वरूप
विलुप्त हो चुके कुंडों और धर्म स्थलों ने पाया आज नव यौवन
-बाबा महाराज के संघर्ष के दर्शन होते हैं इन कुंडों और धर्म स्थलों में
ब्रज द्वार हाथरस। मान गढ़ पर्वत के बाद गहवरवन से शुरू हुआ सिलसिला ब्रज के अनगिनत जर्जर लुप्त हुए धर्मस्थलों को कब्जा मुक्त कराते हुए गहवरवन के साथ-साथ अनेक वन-उपवनों, कुंडों को उनका अपना पौराणिक महत्व और पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है बाबा महाराज ने।
मान गढ़ पर्वत के बाद बाबा महाराज ने गहवरवन के अनगिनत ऐसे स्थानों को जो अपना पौराणिक महत्व ही पूरी तरह धूंधला कर चुके थे, के प्रति कार्य करना आरंभ किया। भले ही उस वक्त उनको यह पता नहीं था कि वह इस कार्य को कर पायेंगे या नहीं, लेकिन उन्होंने अपना कार्य आरंभ कर दिया था और परिणाम आज आपके सामने है कि
उनकी वजह से ब्रज के अनगिनत दुर्लभ प्राय: लुप्ती के कगार पर पहुँच चुके धर्म स्थलियाँ प्रकाश में आए। बाबा महाराज मान मन्दिर में भजन करते और लाड़लीजी मन्दिर में आकर आरतियों में हिस्सा लेते। वाद्य यंत्र बजाते हरि कीर्तन करते। बता दे कि उस वक्त बरसाना का प्रसिद्ध गहवरवन अवैध कब्जों का शिकार था। बाबा महाराज (रमेश बाबा) इस वन को नष्ट होने से बचाने के लिए आगे आये। काफी संघर्षों के बाद बाबा महाराज इस स्थल को संरक्षित करवा पाए। उसके बाद ब्रज में स्थित पुराने धर्म स्थलों के जीर्णोद्धार का जो सिलसिला आरंभ हुआ देखने और सुनने लायक है। बाबा महाराज के आज भी अनवरत चल रहे प्रयासों का ही नतीजा है कि आज रत्न कुंड
ढभाला, विह्वल कुंड संकेत, कृष्ण कुंड नन्दगांव, बिछुवा कुंड बिछोर, गया कुंड कामां, लाल कुंड दुदावली, गोपाल कुंड डीग, रुद्र कुंड जतीपुरा, गोमती गंगा कोसी कलां, ललिता कुंड कमई, नयन सरोवर सेऊ, बिछुआ कुंड जतीपुरा, मेंहदला कुंड हताना, धमारी कुंड और लोहरवारी कुंड आदि सरोवरों का जीर्णोद्धार बाबा महाराज के प्रयासों से ही संभव हो सका है।
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जय जय श्री राधे जय जय श्री बाँके बिहारी लाल की जय हो जय हो
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