क्या संघर्ष कर सकता है समस्या को समाप्त ?

क्या संघर्ष समस्या को समाप्त कर सकता है ?
राम और श्याम दो मित्र थे। दोनों में गहरी मित्रता थी। पुराना जमाना था। अंग्रेजियत का लोगों पर भूत नहीं था। क्योंकि अंग्रेज थे ही नहीं। इसलिए शिक्षा प्रणाली भी पुरानी ही थी। अर्थात गुरुकुल पद्धति थी। जब दोनों मित्र करीब पांच बरस के हुए तो परिजनों ने दोनों को शिक्षा प्राप्ति के लिए गुरुकुल भेज दिया। पढ़ाई में दोनों वेहद रुचि रखते थे। इसलिए शिक्षा के बहुत से गुर वह समय से पहले ही सीखते जा रहे थे। गुरुकुल के निकट ही एक नदी बहती थी। उसी में दोनों मित्र अन्य शिक्षार्थियों संग ब्रह्म मुहूर्त में स्नानादि क्रियायें करते थे। राम विप्र कुल से था व बहुत गंभीर प्रवृत्ति का था और अपने उद्देश्यों के प्रति दृढ़निश्चयी था। जबकि दूसरी ओर श्याम वैश्य परिवार से था और चंचल प्रवृत्ति के साथ-साथ महत्वाकांक्षी (स्वयं को बहुत विशेष महत्व देता था) भी था। राम को तैरना नहीं आता था, लेकिन तार्किक था। वह कुतर्कों से दूर रहता था। उधर, श्याम हर जगह अपनी बात को सिद्ध रखना चाहता था और एक अच्छा तैरनाथा, लेकिन वह एक धनाड्य (पैसे वाले) परिवार से था।
        एक बार की बात है कि बरसात का मौसम था और नदी उफान पर थी। अन्य शिक्षार्थियों के साथ-साथ राम और श्याम भी सुबह नदी स्नान को आये थे। श्याम चूंकि तैरना जानता था और अपनी तैराकी पर उसका गुमान (घमंड)भी बहुत था। बताते हैं, नहाते समय किसी ने कह दिया नदी को कौन पार कर सकता है ? यह सुनते ही श्याम ने आब देखा ना ताब राम के मना करने पर भी वह उफान आ रही नदी में कूद पड़ा। हालांकि राम ने उसको काफी रोका था, लेकिन मित्र की उसने एक नहीं सुनी। बहाव चूंकि तेज था, नदी का आकार भी बढ़ा हुआ था। जिसके कारण श्याम नदी के बीचों-बीच पहुंचते-पहुंचते थक चुका था। इधर, राम सब देख रहा था और हालातों को देखते-देखते राम को सबकुछ समझने में देर नहीं लगी। वह भांप चुका था उसका मित्र श्याम संकट में है। वह मित्र को बचाने की युक्तियां तलाश ने लगा। सुबस का वक्ता था हल्का हल्का अंधकार था। उसने अन्य शिक्षमित्रों से शोर मचाने को कहा और खुद पास में कटे पड़े लकड़ी के पेड़ के एक टहने को लेकर नदी में मित्र को बचाने वास्ते कूद पड़ा। खतरा बहुत था। चूंकि राम पर खुद तैरना नहीं आता था। उसने काफी प्रयास किया और जैसे-तैसे वह श्याम तक तो पहुंच ही गया। उधर, दूसरी ओर अन्य छात्र दोनों को बचाने के लिए शोर मचा रहे थे, लेकिन राम के साहस को देखिए उसने डूबते मित्र को बचा लिया था, लेकिन दुर्भाग्य यह हुआ कि पानी के आये एक तेज बहाव के कारण राम लकड़ी की टहनी से फिसल गया।
 जबकि टहनी के साथ बहते हुए श्याम दूसरी ओर पहुंच ने ही वाला था, मगर अब राम के प्राणों पर संकट था और मृत्यु साफ दिखाई दे रही थी। अचानक उसको गुरुदेव द्वारा दी गई एक शिक्षा याद आई। शिक्षा थी हर व्यक्ति को अपने लक्ष्य के प्रति अंतिम दौर तक प्रयास करना चाहिए। यह सोचते राम ने पानी में हाथ-पैर मारना शुरू कर दिया। मृत्यु चूंकि निकट थी,  लेकिन यह अच्छा हुआ था कि राम के डूबने का समय अब बढ़ गया था, चूंकि पानी में हाथ-पांव मारने से उसका शरीर डूबने से बच रहा था और राम का संघर्ष उसको डूबने से रोक रहा था, लेकिन यह भी कबतक चलता। क्योंकि घड़ी आने ही वाली थी जहाँ मृत्यु निकट थी। राम पूरी तरह थक चुका था और उसके शरीर ने काम करना लगभग बंद ही कर दिया था कि तभी अचानक मानो चमत्कार हुआ। क्योंकि अन्य छात्रों के हल्ला मचाने के कारण सूचना गांव और गुरुकुल तक पहुंच चुकी थी। राम को बचाने वाला हाथ किसी और का नहीं, बल्कि उसके गुरुदेव शिद्धार्थशंकर का ही था। गुरू जी और गांव वालों ने मिल कर दोनों मित्रों को बचा लिया था। मौत को जीतते-जीतते हारना पड़ा था और सभी राम के साहस, सूझबूझ और प्रगाढ़ मित्र संबधों की सराहना कर रहे थे। 

*बताइये आपको इस कहानी से क्या शिक्षा मिलती है ?*

कहानी संकलन

संजय केशव

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