कर्ण को मिला स्वर्ग में सोना तो शुरू हो गये पितृपक्ष

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कर्म किये जा फल की इच्छा मत कर 👇👇👇👇👇👇👇
पितृपक्ष:- सनातन का एक अद्भुत सत्य है। आइये इस पर एक गंभीर चर्चा करते हैं। सनातन में हर दिन कोई न कोई पर्व या त्योहार का विधान है। जो कहीं ना कहीं एक संदेश या शिक्षा पर जाकर टिकता है। यहाँ हर कुछ अलौकिक और सब से अलग हटकर है। बस हमको कुछ करना है तो उसका गंभीरतापूर्वक अध्ययन करना है। गंभीर अध्ययन का है एकचित्त होकर 'भाव' और 'समर्पण' के साथ उसका क्रमबद्ध तरीके से समझना।
पितृपक्ष का उद्भव:- हमारे अध्ययन के अनुसार राजा कर्ण पितृपक्ष के प्रणेता हैं। उन से संबंधित एक छोटी सी कहानी 👇👇👇👇
राजा कर्ण बहुत ही दयालू और सनातनी थे। बताते हैं,  वह प्रति दिन सवा मन सोना प्रति दिन दान करते थे। जब उनका इस लोक को छोड़कर परलोक गमन का वक्त आया और स्वर्ग में पहुँचने पर उनका स्वागत किया गया। भोजन के लिए जो उनको परोसा गया वह आते ही स्वर्ण (सोने) का हो गया। तो राजा कर्ण ने प्रश्न किया ऐसा क्यों हुआ तो उत्तर मिला आपने सिवाय सोने (स्वर्ण) के और कुछ दान किया ही नहीं ? वह चिंतित हुए और उन्होंने कुछ वक्त मृत्यलोक में निवास के लिए मांगा। धर्मराज के समक्ष जब यह बात पहुँची तो गंभीर मंथन किया गया। वमुस्किल उनको मात्र 15 दिन यानी सनातन के हिसाब से एक पखवाड़े का वक्त पृथवी के लिए मिल सका।
        इधर, पृथवी पर राजा के शरीर छोड़ने पर करुण-क्रंदन हो रहा था और लोग उनके ठीक होने की प्रार्थना कर रहे थे। उधर, 15 दिन का वक्त मिलते ही राजा कर्ण पुन: अपने शरीर में जीवंत हो गये और सभी राजा के बच जाने पर खुशियां मनाने लगे, लेकिन पूरा घटनाक्रम तो राजा कर्ण को ही पता था और यह ज्ञात भी था कि उनको मात्र 15 दिन का वक्त मिला है। जबकि इस संसार में कुछ अलग भ्रांतियां थीं। राजा कर्ण ने तत्काल पाकशाला पहुंच कर पकवान और मिष्ठान तैयार करये और फिर लगातार विप्रों और दीनदुखियों भोजन में पकवान और मिष्ठान वह स्वयं परोसने लगे।
 प्रत:काल होते ही वह स्नान के बाद स्वयं लोगों को भोजन कराने में लग जाते और देर रात्रि तक भोजन प्रसादी वितरण करते। लोगों प्रश्न भी बहुत थे, लेकिन एकतो राजा जीवित हुए थे और उनको यह भान (ज्ञान) हो चला था कि हम जो कर्म मृत्युलोक में करेंगे उसी के अनुसार आगे की प्रणाली चलेगी। मृत्यु बाद कोई भी कुछ भी कर्म नहीं कर सकता। इसलिए राजा कर्ण ने लगातार पितृ ऋण के रूप में लगातार विप्रों दीनहीनों को भोजन प्रसादी की क्रम जारी रखा। यह सुनकर अन्यत्र देशों भी लोग उनके राज्य में आने लगे पहले वह स्वर्ण दानी के रूप में प्रसिद्ध थे, लेकिन अब उनकी ख्याती और बढ़ने लगी।
अब यहाँ समझने की बात यह है 👇👇 
हमारे यहाँ ऐसा माना जाता है पितृपक्ष में 
● ना तो डाढ़ी (सेविंग) बनायेंगे
● ना हम किसी साबुन का प्रयोग करेंगे
● ना हम कोई सुगंधित द्रव्य को लगायेंगे
● ना हम किसी दिल दुखायेंगे
● ना हम किसी के साथ अभद्र व्यवहार करेंगे
ज्यादातर घरों में यह पूरे नियम भी अब फालो नहीं किये जाते, लेकिन प्राय: यह देखा जाता है कि बड़े या बुजुर्ग अपनी सेविंग नहीं कराते हैं कुछ घरों में श्राद्धकर्म हो जाने के बाद कपड़े धोलिये जाते हैं। यानी हम पुरातन की लकीरें पीट रहे हैं,लेकिन उसके कारण विशेषों पर नहीं जा पा रहे हैं। 
आइये समझते हैं हमको क्या शिक्षा संदेश मिलता है

 संदेश : राजा कर्ण की तरह हमको पुन: जीवन समय नहीं मिलने वाला इसलिए जीवन को सार्थक बनाने के लिए सभी जिस प्रकार हमारे यहाँ आने वाले पंडित जी से हम सद्व्यवहार करते आदर देते हैं उसी प्रकार हमको सभी के साथ सम्मान अच्छा व्यवहार करना चाहिए
शिक्षा : हम देखते और करते हैं,लेकिन समझते कोई कोई ही हैं। पितृपक्ष में सेविंग करते यह हमने देखा और सुना है, लेकिन क्यों नहीं करते यह समझने चेष्टा ही नहीं कर पाते। दरअसल राजा कर्ण को तो पता था कि उनके पास मात्र एक पखवाड़ा यानी गिनती के 15 दिन हैं। इसलिए साजसज्ज,  रावरंग, घूमना-फिरना यह सभी संसारी बाते हैं, लेकिन प्रभु प्राप्ति के लिए एक-एक पल कीमती है हमको अपने समय को बर्बाद नहीं करना चाहिए। जिस प्रकार राजा कर्ण ने सब त्याग केवल सेवा को अपनाया और अंत में 15 पूर्ण होने पर उन्होंने स्वर्ग के बाद प्रभु धाम की प्रप्ति की। समझने के लिए यह भी पढ़ लीजिए कि भेष से नहीं मन, वचन और कर्म से साधू हैं अर्थात उन्होंने इस संसार के सभी स्वाद छोड़ दिये और प्रभु प्राप्ति दिव्य रस की अनुभूति प्राप्त कर ली है वह इस संसार में न पड़ कर प्रभु स्मरण के साथ-साथ अपने कर्मोपाशना में लगे रहते हैं। 
बाबा गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने लिख दिया है कि, "कर्म प्रधान विश्व रचि राखा,  जस फल बोया तस फल चाखा"

लेखन
संजय केशव दीक्षित 
+91 8630588789

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