दशमी को ही भगवान ने रावण और कंस का वध कर अत्याचार का अंत किया

दशमी को ही भगवान ने रावण और कंस का वध कर अत्याचार का अंत किया
- कृष्ण और कंस, राम और रावण दोनो ही एक राशि, लेकिन कर्म फल का भेद अलग-अलग 
- हरि अनंत हरि कथा अनंता
पौराणिक साक्ष्य को माने तो आज के दिन ही भगवान श्रीकृष्ण ने (कार्तिक शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को) कंस का वध कर उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी। 
        भगवान की हर लीला और चरित्र में अनेकानेक रहस्य छिपे हुए हैं। इन रहस्यों को वह ही जान पाते हैं जिनकी भगवान के प्रति निश्छल भक्ति होती है। भगवान के जन्म और लीलाओं को समझने के लिए समर्पित भाव से लीलाओं का अध्ययन करने की आवश्यकता है।
        आध्यात्म का एक तुलनात्मक अध्ययन करें तो बहुत ही गज़ब की बात निकल कर सामने आती है। भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण अवतार में बहुत कुछ संदेश दिये हैं। जैसे की *राम और रावण*  व *कृष्ण और कंस* अर्थात एक ही राशि। चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि  को भगवान श्रीराम का अवतारण हुआ तो भाद्रपद कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को श्रीकृष्ण अवतारण हुआ। अर्थात एक तिथि नवमी। आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को भगवान श्रीराम ने दैत्य राज रावण का वध कर अत्याचार और आतंक का अंत किया तो कार्तिक शुक्ल पक्ष को भगवान श्रीकृष्ण ने दैत्य राज कंस का वध कर अत्याचार और आतंक का अंत किया। अर्थात यहाँ पर भी एक ही तिथि दशमी है।
        श्रीराम अवतार में मर्यादित जीवन और कर्म की प्रधानता का संदेश दिया है। श्री तुलसीदास जी महाराज ने रामचरितमानस में लिखा भी है कि, "कर्म प्रधानविश्वरचिराखा, जस फल बोया तस फल चाखा।"
        जबकि श्रीकृष्ण अवतार में भगवान योगेश्वर कहलाते हुए गीता में कर्म प्रधानता संदेश देते हुए अर्जुन से केवल कर्म करने को कहा है फल की इच्छा त्याग ने की उचित सलाह दी है।

*गीता श्लोक*
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।2.47।।

अर्थात 👉🏻👇🏻
।।2.47।।तेरा कर्ममें ही अधिकार है ज्ञाननिष्ठामें नहीं। वहाँ ( कर्ममार्गमें ) कर्म करते हुए तेरा फलमें कभी अधिकार न हो अर्थात् तुझे किसी भी अवस्थामें कर्मफलकी इच्छा नहीं होनी चाहिये।
यदि कर्मफलमें तेरी तृष्णा होगी तो तू कर्मफलप्राप्तिका कारण होगा। अतः इस प्रकार कर्मफलप्राप्तिका कारण तू मत बन।
क्योंकि जब मनुष्य कर्मफलकी कामनासे प्रेरित होकर कर्ममें प्रवृत्त होता है तब वह कर्मफलरूप पुनर्जन्मका हेतु बन ही जाता है।
यदि कर्मफलकी इच्छा न करें तो दुःखरूप कर्म करनेकी क्या आवश्यकता है इस प्रकार कर्म न करनेमें भी तेरी आसक्तिप्रीति नहीं होनी चाहिये।

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जय जय श्री राधेश्याम 
जय जय श्री सीताराम

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