द्वापर में यहाँ पर हुआ था प्रथम महारास
महारास प्राकट्य स्थल है चंपकलता सखी मंदिर
-ब्रजद्वार से मासिक यात्रा पहुंची चंपकलता सखी के दरबार
-भजन-कीर्तन के बाद महाप्रसादी का लिया आनंद
ब्रजद्वार (हाथरस)। महारास का प्राकट्य स्थल है चंपकलता सखी मंदिर। सर्व प्रथम यहाँ पर ही राधाकृष्ण ने महारास को रचाया था। अष्ट सखियों में चौथे स्थान की प्रमुख सखी हैं चंपकलता जी।
भक्ति की इन मर्मज्ञ बातों का व्याख्यान श्रीमद्भागवत प्रवक्ता दीदी मुरिलका शर्मा ने गहवरवन वन स्थित राधारस मंदिर में दिया। दरअसल ब्रजद्वार हाथरस से मासिक बरसाना जाने वाली यात्रा का पहला पड़ाव बरसाना के निकट सखी श्री चंपकलता मंदिर ही था। यहाँ पहुंचने पर यहाँ के सेवायत महाराज जी ने बताया कि चंपकलता जी राधा जी की प्रमुख सखियों में से थी और उनका चौथे स्थान आता था।
दतिया के राजा ने जब कालिया नाग लीला के लिए यहाँ के रासधारियों को आमंत्रित किया तो लीला के बाद काफी प्रभावित हुये और एक स्वर्ण से बने मुकुट को भेंट किया। वह आज भी मथुरा में सरकारी संरक्षण में जमा है और साल में एक बार रासलीला उत्सव पर ही निकलता है।
इसके बाद ब्रजद्वार के भक्तों ने सखी चंपकलता मंदिर में भजन-कीर्तन किया और महाप्रसादी लगने के बाद ब्रजवासियों को प्रसादी करा स्वयं भी प्रसाद पाया। इसके बाद ब्रजद्वारी बरसाना पहुंचे और गहवरवन परिक्रमा में दानबिहारीलाल, कुशल बिहारीलाल, नृत्यगोपाल, हंसगोपाल के अलाव बरसाना के प्रमुख दर्शन वृषभान महल पहुंच कर लाडलीलाल जी महाराज के दर्शन किये।
बाद में अष्ट सखी मंदिर, शनिदेव मंदिर, रघुनाथ मंदिर होते हुए श्री राधारस मंदिर पहुँच कर परिक्रमा को पूर्ण कर देररात ब्रजद्वार पहुंच यात्रा को विश्राम दिया।
इस अवसर पर मूलचंद्र वार्ष्णेय, सुभाषचंद्र, योगेंद्रमोहन शर्मा, जितेन्द्र वार्ष्णेय, लक्ष्मीनारायण वार्ष्णेय, अशोक अग्रवाल पेशकश, रोचक जैन, यमुना प्रसाद, आशीष जैन, विकास अग्रवाल, अमित गोयल, नारायण वार्ष्णेय, मनोज गुप्ता, रविद्र वार्ष्णेय (छुट्टन भैया), मनोज वार्ष्णेय व संजय केशव दीक्षित एडवोकेट आदि भक्तजन ने भक्तिरस पान किया।
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