जिहादी आतंक को चाहिए गोपाल पाठा 16 अगस्त की वह भयानक जिहाद

आज फिर एक गोपाल पाठा की जरूरत है
जी हाँ! बाकई आज हमें हर प्रदेश और क्षेत्र की जेहादी आतंकवाद से रक्षा के लिए एक गोपाल पाठा की जरूरत है। दिल्ली के दंगे, बंगाल की बत्तर हालत और बंगला देश के मौजूदा हालात हमको परमपूज्य और देश के महान सपूत श्री गोपाल पाठा खटीक की याद दिलाते हैं।
        बकौल 1947 के बंटवारे में कलकत्ता जिन्ना के फेंके षड्यंत्र का हिस्सा बन भारत से अलग हो जाता यदि श्री महावीर गोपाल पाठा खटीक न होते तो। इतिहास के पन्नों को उठायें तो भाईचारे जैसे शब्द से भी भयानक चीख और मौत का तांडव दिखाई देता है। बतादें कि जिन्ना ने अपने डायरेक्ट एक्शन डे के लिए कोलकाता (कलकत्ता) को चुना था। क्योंकि वो चाहता था कि कोलकाता पाकिस्तान में हो। उसका मुख्य कारण था उस वक्त कोलकाता भारत का एक प्रमुख व्यापारिक शहर था। यही कारण था जिन्ना कोलकाता को खोना नहीं चाहता था। 
        कोलकाता को हिंदू मुक्त बनाने का मिशन सुहरावर्दी को दिया गया था, जो उस वक्त बंगाल का मुख्यमंत्री था, और जिन्ना के प्रति वफादार था। उस वक्त 1946 में कलकत्ता में हिन्दू-मुस्लिम का प्रतिशत 64% और 33% था। अर्थात अपेक्षाकृत हिन्दू संख्या दो गुने थे। बताते हैं, सुहरावर्दी ने 16 अगस्त को अपनी योजना को अंजाम देना शुरू किया था। प्लानिंग के साथ उसके द्वारा एक हड़ताल की घोषणा की गई और सभी मुसलमानों ने अपनी दुकानें बंद कर दीं। साथ ही मस्जिदों में मुस्लिम इकट्ठा हो गए। 
 रमजान का शुक्रवार और 18 वां दिन था। नमाज के बाद मुस्लिम भीड़ हिन्दुओं को कुचलने लगी थी। बताते हैं कि जो उम्मीद कि सुहरावर्दी को  थी, सही होने लगी थी। क्योंकि हिंदुओं ने कोई प्रतिरोध ही नहीं दिखाया था। उसका परिणाम यह था कि मुस्लिम भीड़ के रूप में आगे बढ़ते गये और हिन्दुओं ने घुटने टेक दिए।
        जानकारों कि माने तो उधर, सुहरावर्दी ने मुस्लिम भीड़ को आश्वासन दिया था कि उसने पुलिस को निर्देश दिया है कि वह उनके मिशन में आड़े न आए। मुसलमान लोहे की छड़ों, तलवारों और अन्य खतरनाक हथियारों से लैस हो कलकत्ता के कई हिस्सों और आसपास के इलाकों में फैल गये। सूत्रों की माने तो उन्होंने पहले मुस्लिम लीग कार्यालय के पास हथियारों और हथियारों की एक हिन्दू दुकान पर हमला किया।  उसे लूट लिया गया और जलाकर राख कर दिया गया।  मालिक और उसके कर्मचारियों के सिर काट दिए गए। हिन्दुओं को बुरी तरह मौत के घाट उतारने लगे। यह ही नहीं कई हिन्दू महिलाओं व युवतियों के साथ बलात्कार और शारीरिक शोषण किया गया। 16 अगस्त के बाद 17 अगस्त को भी हत्याएं जारी रहीं। कोलकाता में इस नरसंहार के नंगे नाच चल के चलते हिन्दू भाग रहे थे। सूत्र बताते हैं सुहरावर्दी को 19 अगस्त तक अपनी जीत का आश्वासन दिया गया था। 17 अगस्त तक हजारों हिंन्दू मारे जा चुके थे, लेकिन 18 अगस्त को, एक हिन्दू ने मुस्लिम अत्याचार का विरोध करने का फैसला किया। सुहरावर्दी के इस षड्यंत्र को कुचलने वाला कोई और नहीं बंगाली के खटीक वीरजादे थे। जिनका नाम था गोपाल मुखर्जी। उनके दोस्त उन्हें पाठा कहते थे। क्योंकि वह मीट की दुकान चलाते थे। वह कोलकाता के बोबाजार इलाके में मलंगा लेन में रहते थे। गोपाल उस समय 33 वर्ष के थे और एक कट्टर राष्ट्रवादी व सुभाष चंद्र बोस के दृढ़ अनुयायी थे। जबकि गांधी के अहिंसा के सिद्धांत की आलोचक थे। गोपाल उस वक्त गली-गली संस्था भारत जाति वाहिनी चलाते थे। उनकी टीम में 500-700 लोग थे, सभी अच्छी तरह से प्रशिक्षित पहलवान थे।
        18 अगस्त को गोपाल ने फैसला किया कि वे भागेंगे नहीं, और मुसलमानों पर जवाबी हमला करेंगे। उन्होंने अपने पहलवानों को बुलाया, उन्हें हथियार दिए। एक मारवाड़ी व्यवसायी ने उनको वित्तीय सहायता कर पर्याप्त धन की व्यवस्था की। उन्होंने पहले जवाबी हमलों से हिन्दू क्षेत्रों को सुरक्षित किया। उनका नारा था "हर एक हिन्दू के लिए 10 मुसलमानों को मार डालो!" मुस्लिम लीग के पास लाखों जिहादी थे, जबकि गोपाल के पास केवल कुछ सौ लड़ाके थे, लेकिन उन्होंने एक योजना बनाई, और कोलकाता को मुस्लिम शहर बनने से बचाने के लिए अंत तक लड़ने का फैसला किया। उन्होंने नियम बनाए कि मुसलमानों की तरह वे किसी भी महिला और बच्चों को नहीं छुएंगे। गोपाल के पास खुद आजाद हिन्द फौज की दो  पिस्टल थी। 18 अगस्त की दोपहर से, गोपाल के नेतृत्व में हिंदुओं ने वापस लड़ना शुरू कर दिया। 18 तारीख को जब मुसलमान हिन्दुओं को मारने के लिए हिन्दू कॉलोनी में आए, तो उनका स्वागत गोपाल की टीम ने किया। गोपाल की टीम ने आयेसभी मुस्लिम जेहादियों को मार डाला और 19 तारीख तक उन्होंने सभी हिन्दू उपनिवेशों को सुरक्षित कर लिया था।
        सुहरावर्दी के लिए यह पूरी तरह से सरप्राइज था। उसने सोचा नहीं था कि हिन्दू इस तरह से विरोध करेंगे। जब 19 अगस्त तक उन्होंने हिन्दू क्षेत्रों को सुरक्षित कर लिया था, तो उनका बदला 20 अगस्त से शुरू हो गया था। उन्होंने 16 और 17 अगस्त को हिंदुओं को मारने वाले सभी जेहादियों को चिह्नित किया और 20 अगस्त को उन पर हमला किया। 19 तारीख तक सभी हिन्दुओं तक यह संदेश पहुंच गया कि गोपाल के नेतृत्व में हिन्दू मुसलमानों से लड़ रहे हैं। तो 21 अगस्त तक बहुत सारे हिन्दू उनके साथ हो चुके थे, सभी मुसलमानों से बदला लेने लगे थे। उन्होंने 2 दिनों में इतने मुसलमानों को मार डाला कि मुसलमानों की मौत हिन्दुओं की मौत से ज्यादा हो गई थी। 22 अगस्त तक खेल बदल चुका था। मुसलमान कोलकाता से भाग रहे थे। सुहरावर्दी ने अपनी हार स्वीकार कर ली, और कांग्रेस नेताओं से अनुरोध किया कि वे गोपाल पाठा को रोकने का अनुरोध करें, जो मुसलमानों के लिए यमराज बन गए थे। गोपाल इस शर्त पर तैयार हो गए कि सभी मुसलमान उन्हें अपने हथियार सौंप दें, जिसे सुहरावर्दी ने स्वीकार कर लिया। कोलकाता पर कब्जा करने की जिन्ना की योजना 22 अगस्त तक चकनाचूर हो गई थी। और कोलकाता में भगवा झंडा फहरा रहा था।
        जब सब कुछ खत्म हो गया तो जैसे ही एक फीचर फिल्म के अंत में पुलिस आती है, वैसे ही गांधी ने गोपाल से मुलाकात की और अहिंसा की बात रख हिंदू-मुस्लिम एकता के अपने पाठों को लेकर उनसे अपने शस्त्रों (हथियार) को आत्मसमर्पण करने के लिए कहा, लेकिन उस महान नायक का उत्तर था बंगाल में हुए हिन्दु नरसंहार के वक्त यह अहिंसा का पाठ कहाँ था। 

सुहरावर्दी ने एक जबाव में कहा था, "जब हिन्दू वापस लड़ने का मन बनाते हैं, तो वे दुनिया में सबसे घातक हो जाते हैं!"

गोपाल पाठा और श्यामा प्रसाद मुखर्जी दो महान नायक थे जिन्होंने बंगाल के हिन्दुओं को जेहादी मुस्लिम डकैतों से बचाया था। लेकिन इसे पढ़ने से पहले आप में से कितने लोग गोपाल पाठा के विषय में जानते थे?

जिनको भारत के शिक्षा पाठ्यक्रम में होना चाहिएथा वह देश की घिनौनी कुर्सी अनीती के बलि चढ़ गये। नमन है ऐसे वीर सपूत को। वंदेमातरम 🚩

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