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जिहादी आतंक को चाहिए गोपाल पाठा 16 अगस्त की वह भयानक जिहाद

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आज फिर एक गोपाल पाठा की जरूरत है जी हाँ! बाकई आज हमें हर प्रदेश और क्षेत्र की जेहादी आतंकवाद से रक्षा के लिए एक गोपाल पाठा की जरूरत है। दिल्ली के दंगे, बंगाल की बत्तर हालत और बंगला देश के मौजूदा हालात हमको परमपूज्य और देश के महान सपूत श्री गोपाल पाठा खटीक की याद दिलाते हैं।         बकौल 1947 के बंटवारे में कलकत्ता जिन्ना के फेंके षड्यंत्र का हिस्सा बन भारत से अलग हो जाता यदि श्री महावीर गोपाल पाठा खटीक न होते तो। इतिहास के पन्नों को उठायें तो भाईचारे जैसे शब्द से भी भयानक चीख और मौत का तांडव दिखाई देता है। बतादें कि जिन्ना ने अपने डायरेक्ट एक्शन डे के लिए कोलकाता (कलकत्ता) को चुना था। क्योंकि वो चाहता था कि कोलकाता पाकिस्तान में हो। उसका मुख्य कारण था उस वक्त कोलकाता भारत का एक प्रमुख व्यापारिक शहर था। यही कारण था जिन्ना कोलकाता को खोना नहीं चाहता था।          कोलकाता को हिंदू मुक्त बनाने का मिशन सुहरावर्दी को दिया गया था, जो उस वक्त बंगाल का मुख्यमंत्री था, और जिन्ना के प्रति वफादार था। उस वक्त 1946 में कलकत्ता में हि...

बख्तियार ने दिया था इंसानियत को धोखा, मोदी ने मर्म को तलाश मल्लम लगाना किया आरंभ

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बख्तियार ने दिया था इंसानियत को धोखा, मोदी ने मर्म को तलाश मल्लम लगाना किया आरंभ  1200 सौ साल के जख्म पर नरेंद्र दामोदर दास मोदी ने 19 जून, 2024  बुधवार को मल्लम (दवा) लगाना आरंभ कर दिया और एक बार फिर से अपनी राष्ट्र (सेवा) नीति को स्पष्ट कर दिया, लेकिन सत्ता की लोलुप राज्य करो नीति के अनितिज्ञों को आज भी स्लामियत में अपना भविष्य सुरक्षित दिखाई दे रहा है। जबकि मोदी जी देश, समाज और संस्कृति के काम कर रहे हैं। नालंदा का पुनरोद्धार इसका एक ताजा उदाहरण है। साभार          इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि आक्रांता बख्तियार खिलजी ने 831 ईस्वी में भारत के प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय की इमारत में आग लगा दी थी और जमकर कत्लेआम किया था। इस आग से विश्वविद्यालय में रखी करीब 05 लाख से भी ज्यादा पुस्तकें राख हो गयी थी। उन बेकसूर बौद्ध भिक्षुओं का आखिर क्या कसूर था, जिनको मौत के घाट उतार गया था। इस जघन्य आगजनी और हत्याकांड का सिर्फ और सिर्फ एक ही मकसद था कि भारत की सनातन संस्कृति और उसके ज्ञान को नष्ट करना। सुनी-कही मने तो बख्तियार को एक गंभीर ...

देश को किया राजा देवीसिंह गोदरा ने बलिदान

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बलिदानी ने बलिदान दिया और देश सेवा मान किया -आज ही के दिन हुए थे राजा देवी सिंह गोदारा जी बलिदान -आज उनका 165 वां बलिदान दिवस -शहीदों को शत शत नमन राजा देवी सिंह गोदर (गोदारा जी) का जन्म मथुरा की राया तहसील के अचरु ग्राम के एक जाट क्षत्रिय परिवार में हुआ था। गोदारा जाटों को स्थानीय भाषा मे गोदर भी बोला जाता है। राया क्षेत्र को स्थानीय भाषा में गोदरपट्टी भी बोलते हैं। राया को उनके पूर्वज राजा रायसेन गोदर जी ने ही बसाया था। उन्ही के नाम पर इस कस्बे का नाम राया पड़ा । राजा देवीसिंह धार्मिक स्वभाव के थे और एक अच्छे पहलवान भी थे एक बार वह गाँव में दंगल कर रहे थे। उनके आगे कोई टिक नहीं पाया। जीतने के बाद जब राजा साहब अपनी खुशी जाहिर कर रहे थे, तो एक युवक ने उन पर ताना कसते हुए कहा के यहां ताकत दिखाने का क्या फायदा है दम है तो अंग्रेजों के खिलाफ लड़ो और देश सेवा करो, यही क्षत्रियों का धर्म है। आपके पूर्वजों ने सदा से इस क्षेत्र की रक्षा अपने प्राणों की आहुति देकर की है ।  इसके बाद राजा देवीसिंह जी ने गांव-गांव घूमना शुरू कर दिया और स्वराज के लिए बिगुल बजा दिया। उन्ह...

भक्त वत्सल श्री नृसिंह भगवान प्राकट्य दिवस की बधाई

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*भक्तवत्सल श्री नृसिंह भगवान के प्राकट्य दिवस की आपको बहुत-बहुत बधाई* शत्रुओं की समाप्ति और कामयाबी के देवता हैं नृसिंह भगवान आइये जानते हैं नृसिंह कवच के संबंध में। भगवान विष्णु के अवतरणों में नृसिंह अवतार को सर्वाधिक उग्र तथा भयानक माना गया है। विद्वजनों की माने तो नृसिंह भगवान के स्मरण मात्र से ही दुष्टों में भय का संचार होने लग जाता है। विशेषकर प्रेत, पिशाच आदि दुष्ट शक्तियां उनका नाम सुनने मात्र से ही भाग जाती हैं। कई बार कुछ लोगों को प्रेत बाधा हो जाती है तो उनके लिए भी नृसिंह कवच के प्रयोग से बचाया जाता है। प्रेत बाधा से पीड़ित लोगों की पीड़ा दूर करने के लिए कई प्रकार के उपाय किए जाते हैं परन्तु वे विफल हो जाते हैं। इस स्थिति में व्यक्ति को नृसिंह कवच का आश्रय लेना चाहिए। इस कवच के एक बार जप करने मात्र से ही व्यक्ति का समस्त भय तथा दुख नष्ट हो जाते हैं। नृसिंह कवच का विधान: किसी शुभ मुहूर्त में स्नान आदि से निवृत्त होकर पीले वस्त्र पहन कर पूजा के आसन पर बैठ कर सर्वप्रथम गणेशजी की वंदना करें। तत्पश्चात् अपने इष्टदेव, गुरु तथा अन्य देवी-देवताओं की स्तुति कर...

कन्हैयालाल उत्सव के अध्यक्ष बने पवन पौरुष

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कन्हैयालाल मेला महोत्सव के अध्यक्ष बने पवन पौरुष -ऐतिहासिक रूप देने के लिए अभी से होंगी तैयारी: पवन -150 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है ब्रजद्वार का यह प्राचीन मंदिर  -पूरे जिले में यहाँ का कन्हैयालाल जन्मोत्सव होता है विशेष  हाथरस। ब्रज की द्वार देहरी के आराध्य ठाकुर कन्हैयालाल जी महाराज के हुए चुनाव में पवन सिंह पौरुष को बतौर अध्यक्ष मेला महोत्सव चुना गया। सर्व सम्मति से हुए चुनाव में जैसे पूर्व अध्यक्ष कन्हैयालाल ने आलोक वार्ष्णेय सर्राफ के नाम का प्रस्ताव रखा तो आलोक वार्ष्णेय ने पवन सिंह पौरुष के नाम को लाकर समर्थन कर दिया। तभी पूरे सदन ने भी ताली बजा और कन्हैयालाल के जय घोष कर पवन को मालाओं से लाद दिया। चुनाव में उपस्थित सभी श्रद्धालुओं ने भी पवन को बधाइयाँ दी।         इस अवसर पर पवन सिंह पौरुष ने घोषणा करते हुए कहा कि जो जिम्मेदारी आप सभी मुझे सौंपी है उसे बखूबी जिम्मेदारी के साथ निभाऊंगा। मेला महोत्सव को ऐतिहासिक बनाने के लिए पवने सभी से सहयोग की अपेक्षा की। इस अवसर पर खासतौर से बतौर संरक्षक रमेशचन्द्र ब्रह्मचारी, सेव...

द्वापर में यहाँ पर हुआ था प्रथम महारास

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महारास प्राकट्य स्थल है चंपकलता सखी मंदिर -ब्रजद्वार से मासिक यात्रा पहुंची चंपकलता सखी के दरबार  -भजन-कीर्तन के बाद महाप्रसादी का लिया आनंद  ब्रजद्वार (हाथरस)। महारास का प्राकट्य स्थल है चंपकलता सखी मंदिर। सर्व प्रथम यहाँ पर ही राधाकृष्ण ने महारास को रचाया था। अष्ट सखियों में चौथे स्थान की प्रमुख सखी हैं चंपकलता जी। भक्ति की इन मर्मज्ञ बातों का व्याख्यान श्रीमद्भागवत प्रवक्ता दीदी मुरिलका शर्मा ने गहवरवन वन स्थित राधारस मंदिर में दिया। दरअसल ब्रजद्वार हाथरस से मासिक बरसाना जाने वाली यात्रा का पहला पड़ाव बरसाना के निकट सखी श्री चंपकलता मंदिर ही था। यहाँ पहुंचने पर यहाँ के सेवायत महाराज जी ने बताया कि चंपकलता जी राधा जी की प्रमुख सखियों में से थी और उनका चौथे स्थान आता था।  दतिया के राजा ने जब कालिया नाग लीला के लिए यहाँ के रासधारियों को आमंत्रित किया तो लीला के बाद काफी प्रभावित हुये और एक स्वर्ण से बने मुकुट को भेंट किया। वह आज भी मथुरा में सरकारी संरक्षण में जमा है और साल में एक बार रासलीला उत्सव पर ही निकलता है।   ...

नालंदा विश्वविद्यालय के दोषी बख्तियार खिलज़ी को धूल चटवाई थी राजापृथु ने

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नालंदा विश्वविद्यालय के दोषी बख्तियार खिलज़ी को धूल चटवाई थी असम के राजा पृथु ने ब्रजद्वार, (हाथरस)। भारत की ऐतिहासिक साहित्यिक धरोहर व विश्वप्रसिद्ध शिक्षा भवन नालन्दा विश्वविद्यालय को जला कर नष्ट करने वाले जे हादी  बख्तियार खिलज़ी की मौत भी दर्दनाक थी। दरअसल कहानी कुछ यूं है कि सन 1206 ईसवी में कामरूप (असम) में जब नालंदा को जला नर संहार की बात राजा पृथु को मालूम पड़ती है तो  वह कसम खाते हैं और कहते हैं की "बख्तियार खिलज़ी तू ज्ञान के मंदिर नालंदा को जलाकर  कामरूप (असम) की धरती पर आया है... अगर तू और तेरा एक भी सिपाही ब्रह्मपुत्र को पार कर सका तो मां चंडी (कामातेश्वरी) की सौगंध मैं जीते-जी अग्नि समाधि ले लूंगा"। राजा पृथु और  उनकी सेना ने  27 मार्च 1206 को असम की धरती पर एक ऐसी लड़ाई लड़ी जो मानव  अस्मिता के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। इस युद्ध में बख्तियार खिलज़ी के आये लड़ाकू 12 हज़ार सेनिकों में से सिर्फ 100 सेनिक ही शेष बचे थे।  आज भी गुवाहाटी के पास वो  शिलालेख मौजूद हैं जिस पर इस लड़ाई के विषय में लिखा है।  उस सम...