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नौ में से एक भी प्रकार की भक्ति जिस पर होती है वह मुझे प्रिय है : श्री राम

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नौ में से एक भी प्रकार की भक्ति जिस पर होती है वह मुझे प्रिय है : श्री राम  - वनवास के दौरान माता शबरी को दिया नवधा भक्ति का ज्ञान  भगवान श्री राम ने नौ प्रकार की भक्ति का वर्णन माता सबरी को वनगवन के दौरा दिया है। वैसे नवधा भक्ति को दो युगों में वर्णन मिलता है। प्रथम: *सतयुग में :-* जहाँ, प्रह्लाद ने पिता हिरण्यकशिपु को नवधा भक्ति के विषय में बताया है। जबकि त्रेतायुग में, श्री राम ने माता शबरी को नवधा भक्ति  का ज्ञान दिया है। अर्थात प्रभु प्राप्ति के दो मार्ग है। प्रथम है *माया* माया के माध्यम से जीव कर्म भोग में विचरण कर प्रभु कृपा शुद्ध होता है। जैसे सोना तप कर शुद्ध होता है। जब जीव शुद्धिकरण की ओर चल पड़ता है तो प्रभु कृपा से उसे भक्ति मार्ग का वैभव मिलता है जो सीधे प्रभु मिलन की आस से जोड़ता है। अर्थात यहाँ समझने की बात यह है कि माया कर्मों विचरण करा शुद्ध करती है तो भक्ति मार्ग पर चल कर जीव प्रभु से मिलन कर सकता है। *'नवधा भक्ति'* का अर्थ है 'नौ प्रकार की भक्ति बाबा गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने रामायण (श्रीरामचरितमानस) के अरण्यका...

शबरी के सब्र और भक्ति के भाव पर विभोर हुए श्री राम

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शबरी के सब्र और भक्ति के भाव पर विभोर हुए श्री राम -भक्त के मान को रख बैरों का लगाया रुचि-रुचि भोग  ब्रजद्वार हाथरस। "खुद का मान भले ही चला जाये पर भक्त का मान ना जाने पाये।"  भजन की यह पंक्तियां प्रभु की भक्तवत्सलता का बखान कर रही हैं। क्योंकि वह हर बार अपने भक्तों के मान के लिए ही अवतरित हुए हैं। भक्त प्रह्लाद, नरसिंह  भगत, मीरा आदि के अलाव शबरी माता की भक्ति पर भगवान ने उन्हें वह पद दिया जो अनन्य ऋषि-मुनियों के लिए भी दुर्लभ है।         यह मायने नहीं रखता कि प्रभु स्मरण करने वाला किस जाति और संप्रदाय से है। मायने यह रखता है कि उसकी भक्ति में भाव कैसा है। एक बार की बात है कि जब माता शबरी अपने गुरुदेव मतंग ऋषि के आश्रम के लिए जल भरने गई थी तो........यहाँ यह समझना और स्पष्ट करना आवश्यक है कि 👉🏻  वह जंगलों में रहने वाले अति पिछड़े भील समुदाय से थी और विवाह से पूर्व निरीह पशुओं की बलि देने के विरोध में माता शबरी ने घर-परिवार सब छोड़ दिया था, उनकी सेवा और गुरु भक्ति से प्रसन्न हो ऋषि मतंग ने माता शबरी को अपनी शिष्या स्वीकार ...

चित्रकूट में भगवान विष्णु कामदनाथ व भगवान शिव मत्यगजेंद्र के रूप में आज भी निवास करते हैं

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चित्रकूट में भगवान विष्णु कामदनाथ व भगवान शिव मत्यगजेंद्र के रूप में आज भी निवास करते हैं चित्रकूट के घाट पर, भई संतन की भीर, तुलसीदास चंदन घिसे, तिलक करे रघुवीर'। सियाराम मय सब जग जानी, करहुं  प्रणाम जोर जुग पानी। ब्रजद्वार (हाथरस)। ब्रज के द्वार कहे जाने वाली हाथरस नगरी से पिछले करीब डेढ़ दशक से भी ज्यादा की हुई मासिक  ब्रज बरसाना यात्रा के अलावा द्वारिका, हरिद्वार,  चार धाम (ब्रज) आदि के बाद चित्रकूट की इस यात्रा में भी भक्ति और भाव का संगम सर्वोपरि होगा। *यात्रा के दर्शनीय वह 11 स्थल हैं जो बैकुंठ के मार्ग को खोलते हैं* 01•  जानकी कुंड यह वह स्थान है (वह कुंड है) जहाँ माता जानकी स्नान किया करती थी। इस स्थान पर माता जानकी के चरण-चिन्ह भी मौजूद हैं। माता सीता राजा जनक की पुत्री थी इसलिए उन्हें जानकी भी कहा गया है। 02• स्फटिक शिला श्री राम जी के जीवन का यह वह स्थान है जो रामायण में विशेष स्थान रखता है। पौराणिक सत्य तो यह है कि यहाँ इस स्फटिक शिला पर ही बैठ कर सीताराम जी अपना अधिकांश समय बिताते थे। मध्य-प्रदेश के जिला स...

सबसे पहले राधा जी की नानी मुखराई देवी ने किया था चरुर्कुला नृत्य

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सबसे पहले राधा जी की नानी मुखराई देवी ने किया था चरुर्कुला नृत्य  - ब्रजद्वार के भक्तों ने लगाई सतोहा बिहारी, कुशल बिहारी, दान बिहारी व अष्ट सखी दरबार में अर्जी हाथरस (ब्रजद्वार)। जब नानी मुखराई देवी को यह जानकारी हुई कि उनकी बिटिया कीर्ति देवी को पुत्री (राधिका जी) की प्राप्ति हुई है तो वह मुखराई गांव में पड़े एक रथ के पहिये पर चारों ओर दीप प्रज्ज्वलित कर नृत्य करने लगीं। बाद में यही नृत्य पूरे विश्व में चरुर्कुला नृत्य के नाम से विश्वविख्यात हुआ।          यह जानकरी ब्रजद्वार हाथरस से पहुंची मासिक ब्रज बरसाना यात्रा के दौरान राधा जी के ननिहाल गांव मुखराई में सेवायुत पंडित जी महाराज ने दी। उन्होंने पूरा पारिवारिक वृतांत इस प्रकार बताया 👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻 🌷श्री राधा जी का परिवार🌷 श्री राधा जी के पिताजी श्री वृषभानु जी महाराज थे, माता  श्री कीर्तिदा महारानी (कलावती जी इनका दूसरा नाम था)। भाई श्री दामा सबसे बड़े हैं (और समस्त भाई बहनों में सबसे छोटा एक भाई है जिसका उल्लेख जिव गोस्वामी जी और सूरदास जीने भी कि...

ब्रज की देहरी मे छोटे और बड़े दोनों ठाकुर ने किया नौका विहारण

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ब्रज की देहरी मे छोटे और बड़े दोनों ठाकुर ने किया नौका विहारण -दाऊ मंदिर पर कलियों के श्रृंगार व शास्त्रीय संगीत की धून पर झूमे भक्त  -कन्हैयालाल मंदिर पर पुष्प श्रृंगार के साथ गरजते रहे बादल और होती रही बारिश  -देर रात तक भक्तों के सैलाब से सनातन की सतत गंगा वहती रही हाथरस। जेष्ठ की पूर्णिमा को ब्रज की देहरी पर छोटे और बड़े दोनो ठाकुर ने नौका बिहारण किया। कन्हैयालाल ने रुई की मंडी और दाऊ ने किला राजा दयाराम स्थित मंदिर श्री दाऊजी महाराज में।         नौका बिहारण उत्सव का आरंभ दोनों ठाकुरों की मंगला आरती से हुआ। दोनों स्थानों पर जेष्ठा अभिषेक को मंत्रोच्चारण के साथ संपन्न कराया गया। संध्याकाल किला राजा दयाराम स्थित पुरातात्विक धरोहर मंदिर श्री दाऊजी महाराज में रेवतीरमण के कलियों मनोरम व आलौकिक श्रृंगार सजाये गये। साथ ही बड़े ठाकुर दाऊ ने नौका  बिहारण किया। इस अवसर पर सेवायत पवन चतुर्वेदी, गोवर्धननाथ चतुर्वेदी, संजीव पंडित, बीपी ओझा, विशाल सारस्वत,  योगा पंडित, अशोक गोला, कन्हैयालाल राजपूत के अलाव दर्जनों भक्तजन का सहयोग रहा ...

जय भांडीर: जहाँ पड़ी थी राधा-कृष्ण की भांवरें

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जहाँ पड़ी थी राधा-कृष्ण की भँवरियां -ब्रह्म जी बने थे पुरोहित -ब्रज बरसाना मंडल की भंवरिया ज्योनार  ब्रजद्वार (हाथरस)। जहाँ ब्रह्म जी ने स्वयं राधा-कृष्ण की भाँवरें पड़वाई थी वही स्थान है भांडीर वन। दरअसल ब्रजद्वार से संचालित मासिक ब्रज बरसाना यात्रा बीते रविवार को इस पौराणिक स्थान पर पहुंची तो भक्तों को यहाँ के वैभव की जानकरी हुई।          गर्ग संहिता की माने तो यही स्थान भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी के दांपत्य के प्रमाण का स्थान है। ऐसा माना जाता है कि इन दोनों के मध्य प्रेम संबंध की नहीं थे बल्कि प्रेम से बढ़कर भी एक नाता था और वह नाता था पति-पत्नी का। इस स्थान के वृक्ष आज भी राधा कृष्ण के प्रेम और मिलन की गवाही देते हैं। गर्ग संहिता के अनुसार इस संदर्भ में यह कथा है कि एक बार नंदराय जी बालक श्री कृष्ण को लेकर भांडीर वन से गुजर रहे थे। उसी समय आचानक देवी राधा प्रकट हुई। देवी राधा के दर्शन पाकर नंदराय जी ने श्री कृष्ण को राधा जी की गोद में दे दिया। श्री कृष्ण बाल रूप त्यागकर किशोर बन गए। बताते हैं कि तभी ब्रह्मा जी भी ...

चरित्र की नीच हरकत और अकबर ने मांगी प्राणों की भीख

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चरित्र की नीच हरकत और अकबर ने मांगी प्राणों की भीख -महाराणा की भतीजी ने सिखाया अकबर को चारित्रिक सुधार का पाठ अकबर की महानता का गुणगान तो कई चाटुकार इतिहासकारों ने किया है लेकिन अकबर की औछी हरकतों का वर्णन बहुत कम इतिहासकारों ने किया है।  अकबर अपने गंदे इरादों से प्रतिवर्ष दिल्ली में नौरोज का मेला आयोजित करवाता था जिसमें पुरुषों का प्रवेश निषेध था अकबर इस मेले में महिला की वेष-भूषा में जाता था और जो महिला उसे मंत्र मुग्ध कर देती थी उसे दासियाँ छल कपटवश अकबर के सम्मुख ले जाती थी। एक दिन नौरोज के मेले में महाराणा प्रताप की भतीजी छोटे भाई महाराज शक्तिसिंह की पुत्री मेले की सजावट देखने के लिए आई जिनका नाम बाईसा किरणदेवी था जिनका विवाह बीकानेर के पृथ्वीराज जी से हुआ। बाईसा किरणदेवी की सुंदरता को देखकर अकबर अपने आप पर काबू नही रख पाया और उसने बिना सोचे समझे दासियों के माध्यम से धोखे से जनाना महल में बुला लिया और जैसे ही अकबर ने बाईसा किरणदेवी को स्पर्श करने की कोशिश की किरणदेवी ने कमर से कटार निकाली और अकबर को ऩीचे पटकर छाती पर पैर रखकर कटार गर्दन पर लगा दी और कहा...